रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले – जसगीत
मुखड़ा
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर,
हो चलो हो माया के दरबार हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 1
कातिक महिना धरम के हो माया मोर,
हो तुलसी मा दिया ला जलाये हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 2
अगघन महिना अगम के हो माया मोर,
पूस में मारथे तुषार हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 3
माघ महिना घन अमुवा मौरत हे,
फागुन उड़ थे गुलाल हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 4
चैत महिना रंग तेंदुवा फूलत हे,
वैशाख कुंज निवार हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 5
जेठ महिना लिख पतिया भेजत हैं,
आवन लागे हैं आषाढ़ हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 6
सावन महिना सुहावन के हो माया मोर,
भादो में गहिरा गंभीर हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
अंतरा 7
कुवांर महिना में नममी वो दशहरा,
लंगुरे हां ध्वजा फहराये हो माया मोर।
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
समापन
हो चलो हो माया के दरबार हो माया मोर,
रुमझुम रुमझुम चिरैया बोले माया मोर।
✍ लेखक: unknown
🎤 प्रस्तुतकर्ता: SWARANJALI STUDIO
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